अचलगढ़ के तीन भैंसे - माउंट आबू
माउंटआबू के अचलगढ़ में मंदाकिनी कुंड में खड़े ये पाषाण के तीन भैंसे वहा जाने वालो का ध्यान बरबस खिंच लेते है जिनके बारे में जनश्रुति है की तीन राक्षस मंदाकिनी कुंड के किनारे यज्ञ करने वाले साधू महात्माओं की तपस्या भंग कर देते थे वो कुंड' में भरे घी को पी जाते थे जो यज्ञ के काम में आता था | साधुओ के आबू के परमार राजा धारावर्ष को राक्षसों के आंतंक से मुक्ति दिलवाने के लिए निवेदन करने पर धारावर्ष ने एक ही तीर से तीनो भैंसों को बेध दिया | उसी स्मृति को चीरस्थायी करने के लिए इन पाषाण के तीन भैंसों का निर्माण कर यंहा स्थापित किया गया |
परमार शासक धारावर्ष अपने समय का वीर योद्धा था | गुजरात के सोलंकियो के सामंत के रूप में उसने गुजरात पर हुवे तुर्क आक्रमणों में बड़ी वीरता का परिचय दिया था गुजरात पर 1206 इसवी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने आक्रमण किया जिसमे गुजरात की पराजय हुई उसके बाद शहाबुद्दीन गौरी के आक्रमण के समय गुजरात को विजय प्राप्त हुई |उसके उपरान्त इल्तुतमिश ने भी गुजरात पर आक्रमण किया था इन सभी युद्धों में धारावर्ष ने गुजरात के सेनापति के रूप में भाग लिया और शौर्य दिखलाया | धारा वर्ष के बारे में प्रसिद्द था की वो एक तीर से तीन भैंसों को बेध देता था संभवत ऐसे ही किसी शक्ति प्रदर्शन की स्मृति को चीर स्थायी करने के इन पाषाण के तीन भैंसों का निर्माण करवाया गया होंगा | धारावर्ष ने नाडोल के चौहान शासक कल्हण की पुत्रियों श्रृंगार देवी और गीगा देवी से विवाह कर नाडोल के चौहानों से अच्छे सम्बन्ध स्थापित किये थे | धारावर्ष के पुत्र सोमदत के समय ही वास्तुपाल के छोटे भाई तेजपाल ने आबू के देलवाडा गाँव में नेमिनाथ भगवान् का लूणवसाही नामक मंदिर का निर्माण करोडो रुपयों की लागत से करवाया था |
पाषाण से बने ये तीन भैंसे इतने जिवंत है की लगता है की अभी जिन्दे हो जायेंगे | पास में ही सामने पहाड़ी पर बना अचलगढ़ दुर्ग है जिसे महाराणा कुम्भा ने पुननिर्मित करवाया था |तलहटी में प्राचीन अचलगढ़ मंदिर , सारनेश्वर मंदिर तथा प्राचीन महल आदि स्थित है | .......जय जय
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